क्या बात है यार! बस दो लाइनें, लेकिन कितना कुछ कह गईं। आपने सागर की शांति में छिपे तूफ़ान को जिस तरह से महसूस करवाया, मैं तो वहीं रुक गया। ऐसा लगा जैसे बाहर सब ठहरा हुआ है, लेकिन अंदर लहरें उफान मार रही हैं। कभी-कभी हम भी बाहर से शांत दिखते हैं, लेकिन अंदर खलबली मची होती है।
जब एक दिन इस रोज की खींचतान में मुक्तमाल टूटकर बिखर जायेंगी कुछ मोती नजरों से बचकर बंद अंधेरे में छिपे रहे जायेंगे , शायद वे दोबारा मिल भी जाए तो उपेक्षा में वे एक बार पुनः
निशा की चुनर असंख्य तारों से सजकर किसको ये शगुन भेंट चढ़ाती राह में बार अनगनित दीपक किसकी प्रतीक्षा को बारम्बार अकुलाती ? रात घने अंधेरे तम में डूबा विश्व स्वप्नलोक में जब विचरे खुले नयनालोक से दिपदिप ये कौन किसके सपने देखे ?
कठिन कहीं कुछ भी तो नहीं प्रशस्त है मार्ग , मंजिल तेरे लिए तेरे साथ , खुद तैयार खड़ी हौंसला रखो पहले खुद पे तभी सार्थक सिध्द फलवती तपस्या तेरी , मानव मानवता का वरदान हो निस्स्वार्थ हो
मूर्त अमूर्त दो , एक ही ब्रह्म रुप साकार निराकार का न भेद अनुभूति की व्यापक चेतना देती दोनों को एक समान महत्व एक के अभाव में दूजा अपूर्ण परमात्मा और आत्मा का संबंध अटूट मार्ग अनेक , साध्य एक न कोई बाधा विघ्न विनाशक
क्या बात है यार! बस दो लाइनें, लेकिन कितना कुछ कह गईं। आपने सागर की शांति में छिपे तूफ़ान को जिस तरह से महसूस करवाया, मैं तो वहीं रुक गया। ऐसा लगा जैसे बाहर सब ठहरा हुआ है, लेकिन अंदर लहरें उफान मार रही हैं। कभी-कभी हम भी बाहर से शांत दिखते हैं, लेकिन अंदर खलबली मची होती है।
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