क्या बात है यार! बस दो लाइनें, लेकिन कितना कुछ कह गईं। आपने सागर की शांति में छिपे तूफ़ान को जिस तरह से महसूस करवाया, मैं तो वहीं रुक गया। ऐसा लगा जैसे बाहर सब ठहरा हुआ है, लेकिन अंदर लहरें उफान मार रही हैं। कभी-कभी हम भी बाहर से शांत दिखते हैं, लेकिन अंदर खलबली मची होती है।
जब एक दिन इस रोज की खींचतान में मुक्तमाल टूटकर बिखर जायेंगी कुछ मोती नजरों से बचकर बंद अंधेरे में छिपे रहे जायेंगे , शायद वे दोबारा मिल भी जाए तो उपेक्षा में वे एक बार पुनः
सुनो , नदियाँ गाती है । चुपचाप कान लगाकर किभी सुनना , नदी तुम्हें कोई न कोई गीत गुनगुनाती मिलेगी । जीवन का राग उड़ेलती हुई बतरस से बातें करती हुई मिलेगी तुम्हें एक नदी जरा गौर से सुनना
निशा की चुनर असंख्य तारों से सजकर किसको ये शगुन भेंट चढ़ाती राह में बार अनगनित दीपक किसकी प्रतीक्षा को बारम्बार अकुलाती ? रात घने अंधेरे तम में डूबा विश्व स्वप्नलोक में जब विचरे खुले नयनालोक से दिपदिप ये कौन किसके सपने देखे ?
क्या बात है यार! बस दो लाइनें, लेकिन कितना कुछ कह गईं। आपने सागर की शांति में छिपे तूफ़ान को जिस तरह से महसूस करवाया, मैं तो वहीं रुक गया। ऐसा लगा जैसे बाहर सब ठहरा हुआ है, लेकिन अंदर लहरें उफान मार रही हैं। कभी-कभी हम भी बाहर से शांत दिखते हैं, लेकिन अंदर खलबली मची होती है।
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